4 january

उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति

 

 

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अनूप कुमार भटनागर

उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग गठित करने के लिये बनाया गयाकानून और इससे संबंधित 99वां संविधान संशोधन उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा निरस्त किये जाने के बावजूद यहअभी भी चर्चा का विषय बना हुआ है।

संसद द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन का प्रावधान करने संबंधी कानून और 99वें संविधान संशोधन कीसंवैधानिकता को न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहर की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने अक्तूबर2015 मेंअसंवैधानिक करार दिया था।

इस संविधान संशोधन को असंवैधानिक करार देने के निर्णय के समय से ही संविधान संशोधन की वैधता जैसे मुद्दों पर सुनवाई करनेवाली संविधान पीठ में न्यायाधीशों की संख्या को लेकर दबे स्वर में चर्चा चल रही थी।

इसी बीचसंसद के शीतकालीन सत्र के दौरान आनंद शर्मा की अध्यक्षता वाली कार्मिकलोक शिकायत और विधि एवं न्याय संबंधीसंसदीय स्थायी समिति द्वारा पेश रिपोर्ट में राय व्यक्त की गयी है कि किसी भी संविधान संशोधन की वैधता से जुड़े मामलों कीसुनवाई उच्चतम न्यायालय की कम से कम 11 सदस्यीय न्यायाधीशों की पीठ को करनी चाहिए। 

संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की है कि संविधान के निर्वचन से जुड़े मामलों की सुनवाई भी उच्चतमन्यायालय के कम से कम सात न्यायाधीशों की पीठ को ही करनी चाहिए।

समिति ने रिपोर्ट में इस बात का विशेष रूप से जिक्र किया है कि 99वां संविधान संशोधन अधिनियम लोक सभा ने सर्वसम्मति सेतथा राज्यसभा ने लगभग सर्वसम्मतिएक विसम्मतिवोट से पारित किया था। इस अधिनियम को उच्चतम न्यायालय के पांचन्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 के आधार से खारिज कर दिया।

संविधान संशोधन और संविधान निर्वचन की वैधता से संबंधित मामले की सुनवाई करने वाली उच्चतम न्यायालय की पीठ केसदस्य न्यायाधीशों की संख्या 11 और 7 करने के संबंध में समिति ने अपने तर्क भी दिये हैं।

समिति ने रिपोर्ट में इस तथ्य को नोट किया, ‘‘संविधान के अधिनियमन के दौरान उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्याकेवल सात थी और संविधान के तहत संविधान के निर्वचन से जुड़े किसी मामले के विनिर्णय अथवा अनुच्छेद 143 के तहतसंदर्भित मामले में न्यूनतम पांच न्यायाधीशों वाली न्यायपीठ का गठन होता था।‘‘ रिपोर्ट में आगे कहा गया है, ‘‘अब जबकिन्यायाधीशों की संख्या 31 हो गयी है तो समिति की राय है संविधान संशोधन की वैधता से जुड़े मामलों को उच्चतम न्यायालय केन्यूनतम 11 सदस्यीय न्यायाधीशों की पीठ द्वारा सुना जाना चाहिए।’’

यह सही है कि न्यायाधीशों की नियुक्तियों के लिये आयोग गठित करने संबंधी कानून और संविधान संशोधन की वैधता को चुनौतीदेने वाली याचिकाओ पर पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सुनवाई की थी।

इस संविधान पीठ ने न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के इरादे से सरकार को इससे संबंधित प्रक्रियाके लिए ज्ञापन तैयार करने का निर्देश दिया था जिसे वर्तमान प्रक्रिया में पूरक का काम करना था। यही नहीं न्यायालय ने सरकारको प्रधान न्यायाधीश की सलाह से ही न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित मौजूदा प्रक्रिया के ज्ञापन को अंतिम रूप देने का भीनिर्देश दिया था।

इसमें न्यायाधीशों की नियुक्ति के संदर्भ में कोलेजियम के मार्ग-निर्देशन के लिये पात्रता का आधार और न्यूनतम आयु कानिर्धारणनियुक्ति की प्रक्रिया में पारदर्शिता के बारे में सुझावसचिवालय की व्यवस्था और शिकायतों के निदान की व्यवस्थाकरना आदि शामिल थे। लेकिन सरकार द्वारा भेजे गये प्रक्रिया ज्ञापन को अभी तक अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है।

यह प्रक्रिया ज्ञापन प्रधान न्यायाधीश के पास अगस्त से लंबित है। एक अवसर पर निर्वतमान प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर नेगत वर्ष सितंबर में दावा किया था कि सरकार के साथ इस मामले में सारे मतभेद दो सप्ताह के भीतर सुलझा लिये जायेंगे।

समिति इस बात पर व्यथित थी, ‘‘प्रक्रिया ज्ञापन को अंतिम रूप दिये जाने के संबंध में कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीचगतिरोध बना हुआ है और इसके परिणामस्वरूप संवैधानिक न्यायालयों में रिक्त पदों को भरने में देरी हो रही है और न्याय प्रशासनबुरी तरह प्रभावित हो रहा है।‘‘

यही नहींरिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘समिति आशा करती है कि दोनों पक्ष व्यापक लोकहित के मद्देनजर जल्द ही अपने गतिरोध को दूरकर लेंगे तथा न्याय प्रशासन को इससे प्रभावित नहीं होने देंगे।‘‘

चूंकि संसदीय समिति की यह सिफारिश राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग से संबंधित 99वें संविधान संशोधन को असंवैधानिकघोषित करने के उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायाधीशों की पीठ के फैसले के संदर्भ में की हैइसलिए न्यायाधीशों की नियुक्ति केप्रकरण से जुड़े अब तक के अन्य मसलों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।

विदित हो कि न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित मुद्दे का सवाल है तो सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकार्ड एसोसिएशन बनामभारत सरकार मामले में न्यायमूर्ति एस आर पांडियन की अध्यक्षता वाली उच्चतम न्यायालय के सात न्यायाधीशों की पीठ नेअकटूबर 1993 में ही अपना फैसला सुनाया था।

इस पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति  एम अहमदी,  न्यायमूर्ति जे एस वर्मान्यायमूति एम एम पुंछीन्यायमूर्ति योगेश्वरदयालन्यायमूर्ति जी एन रे और न्यायमूर्ति डा  एस आनंद शामिल थे। इस प्रकरण में आई व्यवस्था को न्यायाधीशों की नियुक्तिके मामले में उच्चतम न्यायालय के द्वितीय निर्णय के रूप में जाना जाता है।

इस निर्णय के परिप्रेक्ष्य में तत्कालीन राष्टपति के माध्यम से सरकार ने इससे जुडे कुछ सवालों पर संविधान के अनुच्छेद 143 केतहत 23 जुलाई 1998 को उच्चतम न्यायालय से राय मांगी थी।

न्यायमूर्ति एस पी भरूचा की अध्यक्षता वाली उच्चतम न्यायालय की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने 28 अक्तूबर1998 को इनसवालों पर अपनी राय दी थी। इस संविधान पीठ ने न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया के संबंध में नौ बिन्दुओं को प्रतिपादितकिया था।

राष्ट्पति द्वारा उच्चतम न्यायालय के पास राय के लिये भेजे गये सवालों पर विचार करके राय देने के लिये गठित इस नौ सदस्यीयसंविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एम मुखर्जीन्यायमूर्ति एस मजमूदारन्यायमूर्ति सुजाता वी मनोहरन्यायमूर्ति जीनानावतीन्यायमूर्ति एस एस अहमद,  न्यायमूर्ति के वेंकटस्वामीन्यायमूर्ति बी एन किरपाल और न्यायमूर्ति जी पटनायकशामिल थे।

इन फैसलों के परिप्रेक्ष्य में संविधान संशोधन और संविधान निर्वचन की वैधता से संबंधित मामलों की सुनवाई करने वाली संविधानपीठ के सदस्य न्यायाधीशों की संख्या के बारे में संसदीय समिति की इस रिपोर्ट में की गयी यह सिफारिश महत्वपूर्ण है।

अब देखना यह है कि संविधान संशोधन और संविधान निर्वचन की वैधता से संबंधित मामले की सुनवाई 11 न्यायाधीशों की पीठऔर सात सदस्यीय न्यायाधीशों की पीठ द्वारा करने संबंधी सिफारिश के साथ संसद में पेश संसदीय समिति की रिपोर्ट पर सरकारक्या दृष्टिकोण अपनाती है

 

7 January

प्रवासी भारतीयों ने एक लंबा सफर तय किया है

 

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* प्रियदर्शी दत्ता

प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन के 15 वें संस्करण का कर्नाटक के बैंगलुरू में 7 से 9 जनवरी 2017 में आयोजनकिया जाएगा। प्रथम वार्षिक सम्मेलन का आयोजन 9 से 11 जनवरी 2003 को किया गया था और अगस्‍त 2000 में गठित एक उच्‍च स्‍तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर इसे 9 जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस अथवा ओवरसीज इंडियन के रूप में अपनाया गया।

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अत्‍यंत उत्‍सुकता के साथ प्रवासी भारतीयों के मुद्दे में दिलचस्पी रखते थे। पोखरण द्वितीय के बाद जब भारत प्रतिबंधों से जूझ रहा था ऐसे में 1998 में उभरते हुए भारत के प्रति अपने संबंधों में मजबूत विश्वास दिखाया। उदारीकरण के वातावरण के बाद भारतीय मूल के समुदाय अपने देश के साथ जुड़ने को तैयार थे। भारत के एक सूचना प्रौद्योगिकी क्षमता केन्‍द्र तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और परमाणु शक्ति के रूप में उभरने से प्रवासी भारतीयों में अत्‍यधिक आत्‍मविश्‍वास जगा दिया था। यह खेल के मैदान से व्यापार सम्मेलनों और अंतरराष्ट्रीय बैठकों जैसे विभिन्‍न स्‍थलों पर दिखाई भी दिया।  

प्रवासी भारतीयों की चिंताएं भारतीय नेतृत्व के मस्‍तिष्‍क में लंबे समय से थीं। ब्रिटेन  में हाऊस ऑफ कॉमन्‍स पर 1841 की शुरूआत में जितना शीघ्र हो सके मॉरीशस में भारतीय अनुबंधित श्रमिकों की दयनीय हालत की जांच के लिए दबाब डाला गया था। यह ब्रिटिश साम्राज्य में गुलामी उन्मूलन (1833) के बाद अनुबंधित व्‍यवस्‍था की शुरुआत के कुछ वर्ष के भीतर हुआ था। इसी तरह से 1894 में कांग्रेस के मद्रास सत्र में दक्षिण अफ्रीकी उपनिवेशों में भारतीयों के मताधिकार से वंचित करने के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया गया था। कांग्रेस  ने पूना (1895) कोलकाता (1896) मद्रास (1898) लाहौर (1900) कोलकाता (1901) और अहमदाबाद (1902) सत्रों में भी इसी तरह के प्रस्तावों को अपनाया। उन दिनों में प्रवासी भारतीयों से अभिप्राय अधिकांश दक्षिण और पूर्वी अफ्रीका में भारतीयों से संबंधित था। इन्‍होंने स्थानीय ब्रिटिश सरकार द्वारा उनके अधिकारों के अतिक्रमण के खिलाफ कई संघर्ष आरंभ किए थे। गांधी-स्मट्स समझौता 1914 उनके लिए एक बड़ी जीत का द्योतक है।

 

दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे बर्मा, सिंगापुर, मलेशिया, थाइलैंड इत्यादि में प्रवासी भारतीय काफी संख्या में थे। इनमें से कइ 1940 के भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आजाद हिंद फौज में स्वयंसेवक रहे और साथ ही फंडिंग का भी इंतजाम किया। मलेशिया में जन्मी तमिल मूल की युवा लड़कियों की कहानियां भी है जिन्होंने बंदूक उठाकर कंधे से कंधा मिलाते हुए उस भारत की आजादी की लड़ाई करने का फैसला किया जिसे उन्होंने कभी देखा भी नहीं था।

 

प्रवासी भारतीय दिवस से महात्मा गांधी के 9 जनवरी 2015 को भारत आगमन की यादें भी ताजा होती हैं। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के अधिकारों के लिए 21 साल तक लड़ाइयां लड़ी। उनके अहिंसक प्रतिरोध का रूप, जिसे उन्होंने सत्याग्रह नाम दिया, उसे लागू तो भारत में किया लेकिन उसका विकास दक्षिण अफ्रीका में हुआ था। गांधी के समय के औपनिवेशिक विश्व में प्रवासी भारतीयों की स्थिति आज की स्थिति से बेहद अलग थी। वो ऐसे दिन थे जब विदेश जाना ये विदेश में बसने को प्रतिष्ठित नहीं माना जाता था। विदेश जाने वाले ज्यादातर भारतीय फैक्ट्रियों में मजदूरी और खेती से जुड़े कार्यों में मजदूर के लिए पट्टे पर (अफ्रीका, वेस्टइंडीज, फिजी, श्रीलंका, बर्मा इत्यादि देशों में) ले जाए जाते थे। लेकिन हिंदू समाज में समुद्री यात्रा निशेध जैसे मध्यकालीन मान्यताओं को बदलने का श्रेय उन्हीं लोगो को जाता है।

औपनिवेशिक काल में नस्लभेद को औपनिवेशिक सरकारों ने राज्य की नीति की तरह स्थापित किया था। लेकिन औपनिवेशिक काल के खात्मे के बाद भी कई दूसरी तरह की समस्याएं पैदा हुई। गांधी के जीवनकाल के दौरान ही सिलॉन (श्रीलंका) और बर्मा (म्यांमार) में भारतीयों और वहां के स्थानीय लोगों के बीच तकरार होने लगी और सिलॉन और बर्मा के लोग भारतीयों से दूरी चाहने लगे।

 

डीएस सेनानायके की सरकार द्वारा पारित शुरुआती 2 प्रस्ताव में ही आजाद सिलॉन के करीब 10 लाख भारतीय मूल के नागरिकों को वहां की नागरिकता से महरूम कर दिया। हालांकि मॉरिसस में भारतीयों ने सत्ता पर पकड़ मजबूत कर ली लेकिन म्यांमार में अल्पसंख्यक बना दिए गए। इस तरह के देशों में भारतीयों को एक नए तरह के नस्लवाद का शिकार होना पड़ा।

औपनिवेशिक काल समुद्री प्रभुत्व का काल भी था। 1950 के आखिर तक पानी के जहाज ही महाद्वीपों के बीच आने जाने का सबसे भरोसेमंद साधन थे। 1960 की शुरुआत में हवाई जहाज ने लंबी दूरी के लिए पसंदीदा आवागमन के साधन के रूप में पानी के जहाज की जगह ले ली। भारत से प्रवास के स्वरूप को देखें तो मानव संसाधन की दक्षता और भारत से आवागमन पर इसकी छाप स्पष्ट देखी जा सकती है। संयोग से करीब उसी समय अमेरिका में पारित हुए अप्रवास और राष्ट्रीयता कानून, 1965 ने कौशल संपन्न पेशेवरों और छात्रों के प्रवास की राह आसान कर दी। इस ऐतिहासिक कानून ने भारतीय प्रवासी समुदाय की संख्या और साख को बदलकर रख दिया। 1960 में जहां 12000 भारतीय अमेरिका में रहते थे वही आज उनकी संख्या 25 लाख हो चुकी है। ये पढ़े लिखे और सफल प्रवासी भारतीय दुनिया भर में फैले भारतीय मूल के लोगों को भी राह दिखा रहे हैं।

 

लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है। समाजवाद के दौर में जब भारत कमजोर विकास दर से जकड़ा हुआ था उस समय यहां के नागरिक विदेशों में अपनी भारतीय पहचान को उजागर होने देना नहीं चाहते थे। भारत में भी अप्रवासी भारतीयों को भगोड़े की तरह देखा जाता था। लेकिन उदारीकरण के बाद विकास दर में तेजी, आईटी पॉवर हब के रूप में भारत का उदय और वाजपेयी सरकार की विकास नीतियों ने मिलकर प्रवासी भारतीयों का हौसला बढ़ाया। सैटेलाइट टीवी, इंटरनेट के आगमन और उसके बाद 1990 के दशक में घर-घर में टीवी की पहुंच के बाद विदेशों में बसे भारतीयों को लगातार अपने देश से संपर्क का साधन मिल गया। अब प्रवासी भारतीयों के लिए भी अपनी जन्मभूमि के हित के बारे में सोचना संभव हो गया। भारतीय और अप्रवासी भारतीय मिलकर देश को दुनिया में ऊंचा स्थान दिलाने के बारे में सोच सकते हैं। इससे नए वैश्विक भारतीय की अवधारणा को बल मिला और इसी नाम के साथ कंचन बनर्जी ने 2008 में बोस्टन में एक मैगजीन भी शुरू की।

 

लेकिन अभी भी दुनिया के कई हिस्सों में भारतीय समुदाय को नस्लवाद, धार्मिक कट्टरता और कानूनी भेदभाव जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। कई मोर्चों पर अभी सफलता मिलनी बाकी है। ऐसे में महात्मा गांधी के 1890 में दक्षिण अफ्रीका में शुरू किए गए संघर्ष की लौ बुझने नहीं देनी है।

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9 January

लंबी अवधि के लिए कृषि विकास को बढ़ावा देने हेतु कदम 

विशेष लेख

भारतीय किसानों का अदम्य साहस

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                                                                *गार्गी परसाई

    वर्ष 2016 में कृषि सरकार की प्राथमिकता सूची में रहा, पर वर्ष के अंत में सरकार की विमुद्रीकरण नीति के कारण यह फीका पड़गया। गौरतलब है कि लगातार दो वर्षों का सूखा भी किसानों के अदम्य साहस को कमजोर नहीं कर पाया जिन्होंने फसल वर्ष 2015-16 के चौथे अग्रिम अनुमान को गलत साबित करते हुए 252.22 मिलियन टन खाद्यान का उत्पादन किया जो पिछले वर्ष 252.02 मिलियन टन के उत्पादन से कहीं ज्यादा है।

    मानसून की कमी के कारण इस वर्ष देश के कुछ हिस्सों में खरीफ की फसल बर्बाद हो गईजिससे धानमोटे अनाजतिलहनदलहन और कपास के उत्पादन में मामूली गिरावट दर्ज की गई। कृषि और किसान कल्याण मंत्री श्री राधा मोहन सिंह ने 29 दिसंबरको नई दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि हालांकि रबी में गेहूं की उपज फसल वर्ष 2015-16 में 93.5 मिलियन टनरहने का अनुमान लगाया गया था जो पिछले वर्ष 86.53 मिलियन टन था और प्राप्ति निर्धारित लक्ष्य की तुलना में कम रहा।आपूर्ति बढ़ाने और कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सरकार ने निजी अकाउंट में शून्य प्रतिशत की ड्यूटी पर गेहूं आयात कीअनुमति देने का निर्णय लिया है।   

    सरकार ने किसानों को आश्वस्त करते हुए कहा है कि वह सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए ज्यादा से ज्यादा खाद्यान कीखरीद करेगी और गेहूं उत्पादकों को न्यूनतम समर्थन मूल्य, जो सरकार ने फसल वर्ष 2016-17 के लिए 1625 रूपया प्रति क्विंटलतय किया है, हेतु तेजी से बाजार में हस्तक्षेप भी करेगी।

    इस तरीके से 2016 में कृषि के क्षेत्र में भी तेजी से डिजिटलीकरण का विकास हुआ है जिसके परिणामस्वरूप मोबाइल एप कीशुरूआत की गई है। कृषि मंत्रालय ने मौसम की जानकारीबाजार की कीमतों और फसल रोगों की जानकारी देने के लिए किसानसुविधाएप का शुभारंभ किया; “पूसा कृषि” एप बीज की नई किस्मों और नवीनतम तकनीक की जानकारी उपलब्ध करा रहा है; “कृषि बाजार” एप किसानों को 50 किलोमीटर के दायरे में मंडी की कीमतों के बारे में जानकारी देता है; “फसल बीमा एप फसलबीमा से संबंधित सारी जानकारी देता हैफसल को काटने संबंधित जानकारी क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट्स एप के जरिए मिलती है।लाखों किसान इन सारे एप्स को डाउनलोड कर लाभान्वित हो रहे हैं।

    इस वर्ष न सिर्फ किसानों के लिए बैंकिंग प्रणाली द्वारा कृषि क्षेत्र को ऋण देने की सीमा बढ़ाकर 9 लाख करोड़ की गई है बल्किविमुद्रीकरण के बाद सरकार ने भुगतान के लिए कैशलेस लेन-देन और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण को प्रोत्साहित करने हेतु भी कई पहलकी हैं। यदि ऐसा होता है तो मंडी संचालन में मीडिल मैन/कमीशन एजेंटों से किसानों को मुक्ति मिलेगी जिससे इन्हें अपनी फसलका न्यूनतम समर्थन मूल्य प्राप्त करने में सुविधा होगी जो इन सब किसानों के लिए बड़ा कदम होगा।          

     जैसा हमने देखा कि वर्ष 2016 में सरकार ने कृषि क्षेत्र को उच्च प्राथमिकता दीताकि उर्वरकों के असंतुलित इस्तेमाल से प्रभावितहो रहे क्षेत्रों जैसे मृदा स्वास्थ्य (मृदा स्वास्थ्य कार्डनीम लेपित यूरिया और जैविक खेती), जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों सेकिसानों की आय के प्रभाव को कम करने के लिए (फसल बीमा योजना), निर्बाध व्यापार के लिए एक इलेक्ट्रॉनिक मंच (राष्ट्रीयकृषि ई-मार्केट) तथा ज्यादा-से-ज्यादा भूमि को सिंचित खेती के तहत लाने के लिए (प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना) कदम उठायेगये। इसके साथ ही अन्य संबंधित क्षेत्रों जैसे दलहनतिलहनबागवानीमत्स्यपशुपालनदुग्धकृषि वानिकीमधुमक्खी पालनकृषि शिक्षाअनुसंधान और विस्तार पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है।

    वर्ष 2021 तक किसानों की आय को दोगुना करने की सरकार की प्रतिबद्धता के तहत वित्त मंत्री श्री अरूण जेटली ने लंबी अवधिके उपायों की घोषणा की है और कृषि परिव्यय जो वित्तीय वर्ष 2015-16 के बजट में 15809 करोड़ रूपये था उसे बढ़ाकर 39884 करोड़ रूपये किया। अंतरिम बजट में कृषि कल्याण उपकर के जरिए भी इस क्षेत्र को 5000 करोड़ रूपये की अतिरिक्त राशि मिलेगी।   

     इसके अलावे नाबार्ड के सहयोग से 20000 करोड़ रूपये की  राशि का एक अतिरिक्त कोष भी प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना केतहत बनाया गया है जिसके तहत हर खेत को पानी देने का उद्देश्य रखा गया है। इसके तहत वर्ष 2019 तक 76.03 लाख हेक्टेयर क्षेत्रको सिंचाई के तहत लाया जाना प्रस्तावित है।  

    किसानों को मानसून के प्रभाव से बचाने में सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से सरकार ने इस वर्ष से 5500 करोड़ रूपये की राशि केप्रावधान के साथ प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की शुरूआत की है। इस योजना के तहत राज्य और केन्द्र सरकार मिलकरप्रीमियम की 90 प्रतिशत राशि का वहन करेंगे। इस खरीफ वर्ष में 21 राज्यों के 366.64 लाख किसानों को इसके दायरे में लाया गयाहै।  

    किसानों को उनकी उपज के विपणन और लाभकारी मूल्य प्राप्त करना सबसे बड़ा चिंता का विषय रहा है जिसके लिए सरकार ने 10 राज्यों के 250 से अधिक मंडियों को बेहतर कीमत वसूली और व्यापक पहुँच के लिए ई-एनएएन (राष्ट्रीय कृषि बाजार) पोर्टल केतहत एकीकृत किया है। पिछले सप्ताह तक इस इलेक्ट्रोनिक प्लेटफार्म के जरिए 713.21 करोड़ रूपये का लेन-देन सम्पादित कियागया है जिसे विपणन के क्षेत्र में पारदर्शिता लाने की दिशा में एक बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है।   

    दाल की कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए सरकार ने आयात और घरेलू आपूर्ति के जरिए 2 मिलियन टन का बफर स्टॉकबनाया है। इसी समय राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत सरकार ने दालों के लिए ज्यादा आवंटन किया है और उत्पादन बढ़ाने केलिए भी कई उपाय किए हैं।  सरकार ने अगले वर्ष 20.75 मिलियन टन दाल के उत्पादन का लक्ष्य रखा है जबकि पिछले वर्षउत्पादन 16.47 मिलियन टन रहा था। इसके साथ ही गन्ना किसानों के बकाये का भी तेजी से भुगतान किया जा रहा है।    .   

    मानसून के प्रभाव का डर किसानों को हमेशा लगा रहता है। सरकार ने किसानों की फसलों को सूखा, बाढ़ और ओलों इत्यादि सेहोने वाले नुकसान से बचाने के लिए मुआवजे के मानदंडों में संशोधन किया है। फसल क्षति ग्रस्त होने पर किसान 33 प्रतिशत केबजाय 50 प्रतिशत मुआवजे के पात्र होंगे। पिछले दो वर्षों में राष्ट्रीय आपदा राहत कोष के तहत राज्यों को 24556 करोड़ रूपये खर्चकरने के लिए दिया गया है। क्षतिग्रस्त फसलों की तस्वीरें अपलोड करने के लिए स्मार्ट फोन और इसके आकलन के लिए ड्रोन जैसीअत्याधुनिक तकनीकों का भी इस्‍तेमाल  किया जा रहा है।

      पूर्वी और उत्तर पूर्वी राज्यों में बढ़ती जनसंख्या की खाद्य सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए दूसरी हरित क्रांति पर नएउत्साह के साथ ध्यान केंद्रित किया गया है। समग्र अर्थव्यवस्था के विकास के लिए इस क्षेत्र का विकास महत्वपूर्ण है। उम्मीद है किइस वर्ष कृषि की विकास दर पिछले वर्ष की तुलना में 1.1 प्रतिशत अधिक होगा।

9 January

युवाओं को परिवर्तन की मुख्‍यधारा में लाना 


विशेष लेख

राष्ट्रीय युवा दिवस, 12 जनवरी

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सुधीरेन्द्र  शर्मा 

युवाओं की उद्यमी महत्वाकांक्षा और उपभोक्तावादी इच्छाओं को उनके दृष्टिकोण और विवेकपूर्ण कार्यों में नैतिकता और नैतिकमूल्यों को विकसित करने हेतु विवेकानंद का जन् दिवस 12 जनवरी देश के युवाओं को समर्पित है। आज के युवा बाजार संचालितउपभोक्तावादी संस्कृति के त्यधिक दिखावे से सम्मोहित हैं।

वृद्ध कार्यशक्ति के जोखिम का सामना करने वाली अन् उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के विपरीत भारत वर्ष 2020 तक कार्यआयुवर्ग में अपनी जनसंख्या के 64 प्रतिशत के साथ देश का सबसे युवा राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है। यह जनसांख्यिकीयलाभांश’ देश के लिए एक महान अवसर प्रदान करता है। सिर्फ संख्या में ही नहीं अपितु देश की सकल राष्ट्रीय आय में भी युवा 34 प्रतिशत योगदान करते हैं।

2020 तक 28 वर्ष की औसत आयु के साथ भारत की जनसंख्या के 1.3 बिलियन से अधिक होने की संभावना हैजो चीन औरजापान की औसत आयु की तुलना में काफी कम है। चीन के (776 मिलियनके बाद भारत की कामकाजी जनसंख्या में 2020 तक 592 मिलियन तक वृद्धि की संभावना है। यह इस तथ् की ओर संकेत देती है कि युवा देश के आर्थिक विकास में महत्वपूर्णयोगदान देंगे।

हालांकि एक आभासीय दुनिया से अत्यधिक घनिष् रूप से जुड़े होने के कारण इस आकांक्षा वर्ग को राष्ट्र निर्माण के प्रयासों मेंयोगदान करने के लिए निर्देशों की आवश्यकता होती है। उत्पादकता सुधार में उनकी श्रम सहभागिता को बढ़ाना ही उनकी ऊर्जा कोसाधने का अंग होगा। चूंकि उनकी विचारधारा प्रौद्योगिकी के द्वारा प्रति स्थापित हो चुकी हैइसलिये युवा शायद ही कभी अपनेको इस दुनिया से परे देखते हैं।

इस तरह के पीढ़ी परिवर्तन ने पहले की किसी भी पीढ़ी से एक बेहद अलग पीढ़ी का निर्माण किया है। युवा स्वयं को स्वतंत्रता केपश्चात् की समयावधि की राष्ट्र निर्माण गाथा से दूर महसूस करते है और अपने को एक ऐसी दुनिया का प्राणी समझते हैजोआशाप्रेम और दिव् आशावाद के रूप में बढ़ रही है। इस प्रकार राष्ट्रीय युवा दिवस देश के लोकाचार को युवाओं से जोड़ने का एकअवसर है।

हालांकि 12 जनवरी को 1985 से प्रति वर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता हैजिसका उद्देश् सरकार की युवा लक्षितयोजनाओं और कार्यक्रमों को राष्ट्रीय युवा नीति 2014 के द्वारा निर्देशित करना हैजिसके तहत राष्ट्रों के समुदाय में अपना सहीस्थान प्राप् करने के लिए सक्षम भारत के माध्यम से उनकी पूर्ण क्षमता को प्राप् करने हेतू देश के युवाओं को सशक् बनाना है।

भारत सरकार वर्तमान में युवा लक्षित (उच् शिक्षाकौशल विकासस्वास्थ् देखभाल के लिए 37 हजार करोड़ रूपयेगैर लक्षित (खाद्य सब्सिडीरोजगार के लिए 55 हजार करोड़ रूपयेके कार्यक्रमों के माध्यम से प्रति वर्ष युवा विकास कार्यक्रमों पर 92 हजारकरोड़ रूपये और प्रत्येक युवा पर व्यक्तिगत तौर से करीब 2710 रूपये से अधिक का निवेश करती है।

इसके अलावा राज् सरकारें और अन् बहुत से हितधारक युवा विकास और उत्पादक युवा भागीदारी को सक्षम बनाने की दिशा मेंसहायता के लिए कार्य कर रहे हैहालांकि गैर-सरकारी क्षेत्र में युवा मुद्दों पर कार्य कर रहे व्यक्िगत संगठन छोटे और बंटे हुए हैंऔर विभिन् हितधारकों के बीच समन्वय बढ़ाए जाने की आवश्यकता है।

हालाकि यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि सभी इतिहासों में युवा परिवर्तन राष्ट्रों के लिए स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर नईप्रौद्योगिकियों के सृजन में अग्रदूत रहे हैं जिन्होंने कलासंगीत और संस्कृति के नए स्वरूपों का भी सृजन किया। इसलिए युवाओंके विकास में सहायता और प्रोत्साहन सभी क्षेत्रों और हितधारकों में सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता है।

 

युवा को एक कैडर के रूप में निर्मित करने की चुनौती स्वयं की छोटी सोच से परे कार्य करने और सोचने का मार्ग तय करती है। येकार्य उन्हें उपभोग की विचारधारा से ऊपर उठनेव्यापक सांस्कृतिक विविधता की सराहना करने के लिए विचार करने और एकऐसा बहु-आयामी परिवेश तैयार करने में मदद करती हैजहां वे सहजता से धर्मयौन अभिविन्यास और जातियों में भेद किये बिनाएक दूसरे को गले लगाने को तैयार हैं।    

युवाओं को दार्शनिक दिशा-निर्देश देने के मामले में स्वामी विवेकनंद से बेहतर कौन हो सकता हैजिनके 1893 में विश्व धर्म संसद मेंदिए गए संभाषण ने उन्हें पश्चिमी दुनिया के लिए भारतीय ज्ञान का दूत के रूप में प्रसिद्ध किया था। स्वामी विवेकनंद का माननाथा कि एक देश का भविष्य उसके युवाओं पर निर्भर करता है और इसीलिए उनकी शिक्षाएं युवाओं के विकास पर केंद्रित थीं।

पिछली पीढ़ियों की तुलना में एक वैचारिक समानता से लगाव को देखते हुए देश का युवा इन शिक्षाओं को ग्रहण करने के लिए बेहतरस्थिति में है और वर्तमान पीढ़ी के द्वारा इन्हें आसानी से इन्हें आत्मसात किया जा सकता है। ये नई पीढ़ी एक बड़ी बाधा भी होसकती है क्योंकि इन्होंने अपने आप को राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों से दूर कर लिया है।

हालांकि जे वाल्टर थॉम्पसन का एक अध्ययन आशा कि किरण लेकर आता है उनके अनुसार आज का युवा ने उपभोग का दूसरापहलु देखा है और वह बेयौन्स की तुलना में मलाला से अधिक प्रेरित है। इस पीढ़ी को नैतिक उपभोग आदतोंस्वदेशी डिजिटलप्रौद्योगिकी के उपयोगउद्यशीलता महत्वकांक्षा और प्रगतिशील विचारों की विशेषता से चित्रित किया जा सकता है। वास्तव मेंउन्हें सही दिशा के लिए दार्शनिक मार्ग दर्शन की आवश्यकता है और राष्ट्रीय युवा दिवस इस मामले में युवाओं को परिवर्तन कीमुख्यधारा में लाने के लिए एक सबसे उचित मंच है।   

 

 

डॉसुधीरेन्द्र शर्मा विकास मुद्दों पर शोध और लेखन करते हैं। इस लेख में व्यक्त विचार स्वयं लेखक के हैं।

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16 January

स्वच्छ भारत मिशन: आगे की राह

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                                                                                                                                                                                                                                                                                                                          उमाकांत लखेड़ा

महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका में बिताए वर्षों में दो घटनाएं साफ तौर पर प्रभावित करती हैं। पहली, वह नस्लीय भेदभाव जिसका उन्हें ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में सामना करना पड़ा, जब उन्‍हें एक असभ्य यूरोपियन नागरिक द्वारा उनके सवालों से तंग आकर पीटरमैरिट्सबर्ग स्टेशन पर ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया था।

 

और, दूसरी घटना साफ-सफाई और स्वच्छता से संबंधित है। जब गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका के गरीब काले पुरुषों को दूसरों के शौचालय की सफाई और उनके मलमूत्र को सिर पर बाल्टी में ले जाते देखा तो उन्हें आंतरिक दु:ख हुआ। इस छोटी सी घटना ने उनकी अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया। इसी दिन गांधी जी ने प्रतिज्ञा की कि वे अपने शौचालय की सफाई खुद करेंगे। उन्होंने अपने व्रत को मन में दोहराते हुए प्रतिज्ञा की, यदि हम अपने शरीर को खुद साफ नहीं रख सकते तो हमें अपने स्वराज से बेईमानी एक दुर्गंध की तरह होगा।

 

गांधी जी के इन्हीं साफ-सफाई से संबंधित आदर्शों को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने गांधी जी की जयंती 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन ” की शुरूआत करने के लिए चुना। प्रधानमंत्री जी का स्वच्छ भारत के प्रति दृष्टिकोण और विचार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के दुर्गंध-मुक्त स्वराज  के प्रति ही बढ़ा एक और कदम है।

 

यह मिशन, जो केंद्र सरकार के विशालतम स्वच्छता कार्यक्रम का हिस्सा है, को शहरी तथा ग्रामीण घटकों में विभाजित किया गया है। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य महात्मा गांधी की 150वीं जयंती 2 अक्टूबर 2019 तक भारत को स्वच्छ बनाना है।

 

स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) की कमान शहरी विकास मंत्रालय को दी गई है और 4041 वैधानिक कस्बों में रहने वाले 377 लाख व्‍यक्तियों तक स्वच्छता हेतु घर में शौचालय की सुविधा प्रदान करने का काम सौंपा गया है। इसमें पांच वर्षों में करीब 62009 करोड़ रूपये व्यय का अनुमान है जिसमें केन्द्र सरकार 14623 करोड़ रूपये की राशि सहायता के तौर पर उपलब्ध करायेगी। इस मिशन के अंतर्गत 1.04 करोड़ घरों को लाना है जिसके तहत 2.5 लाख सामुदायिक शौचालय सीटें उपलब्ध कराना, 2.6 लाख सार्वजनिक शौचालय सीटें उपलब्ध कराना तथा सभी शहरों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की सुविधा मुहैया करना है।

इस मिशन के 6 प्रमुख घटक हैं-

1. व्यक्तिगत घरेलू शौचालय;

2. सामुदायिक शौचालय;

3. सार्वजनिक शौचालय;

4. नगरपालिका ठोस अपशिष्ट प्रबंधन;

5. सूचना और शिक्षित संचार (आईईसी) और सार्वजनिक जागरूकता;

6. क्षमता निर्माण  

शहरी मिशन के तहत खुले में शौच को समाप्त करनाअस्वास्थ्यकर शौचालयों को फ्लश शौचालयों में परिवर्तित करना; और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की सुविधा का विकास करना है। इस मिशन के तहत लोगों को खुले में शौच के हानिकारक प्रभावों, बिखरे कचरे से पर्यावरण को होने वाले खतरों आदि के बारे में शिक्षित कर उनके व्यवहार में परिवर्तन लाने पर विशेष जोर दिया जाता है। इन उद्देश्यों को पूरा करने में शहरी स्थानीय निकायों का बेहतरीन तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है तथा साथ ही इसमें निजी क्षेत्र की भी भागीदारी ली जा सकती है।          

 

ग्रामीण मिशन, जिसे स्वच्छ भारत ग्रामीण के नाम से जाना जाता है, का उद्देश्य 2 अक्टूबर 2019 तक खुले में शौच से ग्राम पंचायतों को मुक्त करना है। इस मिशन की सफलता के लिए गांवों में व्यक्तिगत शौचालयों के निर्माण को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ सार्वजनिक-निजी भागीदारी से क्लस्टर और सामुदायिक शौचालयों का निर्माण करना भी है।

 

 

गांव के स्कूलों में गन्दगी और मैली की स्थिति को देखते हुएइस कार्यक्रम के तहत स्कूलों में बुनियादी स्वच्छता सुविधाओं के साथ शौचालयों के निर्माण पर विशेष जोर दिया जाता है। सभी

ग्राम पंचायतों में आंगनबाड़ी शौचालय और ठोस तथा तरल कचरे का प्रबंधन इस मिशन की प्रमुख विषय-वस्तु है। नोडल एजेंसियां ग्राम पंचायत और घरेलू स्तर पर शौचालय के निर्माण और उपयोग की निगरानी करेंगी। ग्रामीण मिशन के तहत 134000 करोड़ रूपये की लागत से 11.11 करोड़ शौचालयों का निर्माण किया जा रहा है।

 

 

व्यक्तिगत घरेलू शौचालय के प्रावधान के तहत, बीपीएल और एपीएल वर्ग के ग्रामीणों को केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा प्रत्येक शौचालय के लिए क्रमश: 9000 रुपये और 3000 रुपये का प्रोत्साहन -निर्माण और उपयोग के बाद- दिया जाता है। उत्तर-पूर्व के राज्यों, जम्मू-कश्मीर तथा विशेष श्रेणी के क्षेत्रों के लिए यह प्रोत्साहन राशि क्रमश: 10800 रुपये और 1200 रुपये है।

 

 

कार्यान्वयन की नियमित रूप से समीक्षा की जा रही है, परिणाम उम्मीद से अधिक हैं। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2014-15 में 5854987 शौचालयों का निर्माण किया गया जबकि लक्ष्य 50 लाख शौचालयों का ही था। इसमें लक्ष्य के 117 प्रतिशत तक सफलता हासिल हुआ है। 2015-16 में 127.41 लाख शौचालयों का निर्माण किया गया है जो लक्ष्य 120 लाख से ज्यादा है। 2016-17 में लक्ष्य 1.5 करोड़ रखा गया और इसमें 1 अगस्त 2016 तक 3319451 शौचालयों का निर्माण पूरा कर लिया गया है तथा बाकी के लिए भी तेजी से काम चल रहा है।

 

 

ग्रामीण मिशन के तहत 1 अक्टूबर 2014 से 1 अगस्त 2016 तक 210.09 लाख शौचालयों का निर्माण किया गया है। इसी अवधि में स्वच्छता का दायरा 42.05 प्रतिशत से बढ़कर 53.60 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

 

 

हालांकि, अंत में, स्वच्छता की कार्यप्रणाली में क्या व्यवहारिक परिवर्तन हुआ है यही मायने रखता है। यह जिलाधिकारियोंसीईओजिला पंचायत तथा जिला पंचायत के अध्यक्षों के संयुक्त प्रयासों का प्रतिफल होता है। इस सफाई अभियान से संबंधित राज्य स्तरीय कार्यशालाओं द्वारा अलग-अलग राज्यों में कार्य किया जा रहा है।

 

 

अंत में यह कि प्रधानमंत्री भी स्वच्छ भारत मिशन की सफलता के लिए मजबूती से इसके पीछे खड़े हैं। केन्द्र और राज्यों के बीच समन्वय उसके प्रतिनिधियों के राज्यों का दौरा करने और समन्वय बैठकों में भाग लेने से बढ़ा है। अंतत: हम कह सकते हैं कि स्वच्छ भारत मिशन सही रास्ते पर अग्रसर है।

 

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 16 jan

स्वच्छ भारत मिशन: आगे की राह

http://pibphoto.nic.in/documents/rlink/2017/jan/i201711303.jpg

उमाकांत लखेड़ा

महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका में बिताए वर्षों में दो घटनाएं साफ तौर पर प्रभावित करती हैं। पहली, वह नस्लीय भेदभाव जिसका उन्हें ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में सामना करना पड़ा, जब उन्‍हें एक असभ्य यूरोपियन नागरिक द्वारा उनके सवालों से तंग आकर पीटरमैरिट्सबर्ग स्टेशन पर ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया था।

 

और, दूसरी घटना साफ-सफाई और स्वच्छता से संबंधित है। जब गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका के गरीब काले पुरुषों को दूसरों के शौचालय की सफाई और उनके मलमूत्र को सिर पर बाल्टी में ले जाते देखा तो उन्हें आंतरिक दु:ख हुआ। इस छोटी सी घटना ने उनकी अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया। इसी दिन गांधी जी ने प्रतिज्ञा की कि वे अपने शौचालय की सफाई खुद करेंगे। उन्होंने अपने व्रत को मन में दोहराते हुए प्रतिज्ञा की, यदि हम अपने शरीर को खुद साफ नहीं रख सकते तो हमें अपने स्वराज से बेईमानी एक दुर्गंध की तरह होगा।

 

गांधी जी के इन्हीं साफ-सफाई से संबंधित आदर्शों को ध्यान में रखते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने गांधी जी की जयंती 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन ” की शुरूआत करने के लिए चुना। प्रधानमंत्री जी का स्वच्छ भारत के प्रति दृष्टिकोण और विचार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के दुर्गंध-मुक्त स्वराज  के प्रति ही बढ़ा एक और कदम है।

 

यह मिशन, जो केंद्र सरकार के विशालतम स्वच्छता कार्यक्रम का हिस्सा है, को शहरी तथा ग्रामीण घटकों में विभाजित किया गया है। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य महात्मा गांधी की 150वीं जयंती 2 अक्टूबर 2019 तक भारत को स्वच्छ बनाना है।

 

स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) की कमान शहरी विकास मंत्रालय को दी गई है और 4041 वैधानिक कस्बों में रहने वाले 377 लाख व्‍यक्तियों तक स्वच्छता हेतु घर में शौचालय की सुविधा प्रदान करने का काम सौंपा गया है। इसमें पांच वर्षों में करीब 62009 करोड़ रूपये व्यय का अनुमान है जिसमें केन्द्र सरकार 14623 करोड़ रूपये की राशि सहायता के तौर पर उपलब्ध करायेगी। इस मिशन के अंतर्गत 1.04 करोड़ घरों को लाना है जिसके तहत 2.5 लाख सामुदायिक शौचालय सीटें उपलब्ध कराना, 2.6 लाख सार्वजनिक शौचालय सीटें उपलब्ध कराना तथा सभी शहरों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की सुविधा मुहैया करना है।

इस मिशन के 6 प्रमुख घटक हैं-

1. व्यक्तिगत घरेलू शौचालय;

2. सामुदायिक शौचालय;

3. सार्वजनिक शौचालय;

4. नगरपालिका ठोस अपशिष्ट प्रबंधन;

5. सूचना और शिक्षित संचार (आईईसी) और सार्वजनिक जागरूकता;

6. क्षमता निर्माण

शहरी मिशन के तहत खुले में शौच को समाप्त करनाअस्वास्थ्यकर शौचालयों को फ्लश शौचालयों में परिवर्तित करना; और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की सुविधा का विकास करना है। इस मिशन के तहत लोगों को खुले में शौच के हानिकारक प्रभावों, बिखरे कचरे से पर्यावरण को होने वाले खतरों आदि के बारे में शिक्षित कर उनके व्यवहार में परिवर्तन लाने पर विशेष जोर दिया जाता है। इन उद्देश्यों को पूरा करने में शहरी स्थानीय निकायों का बेहतरीन तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है तथा साथ ही इसमें निजी क्षेत्र की भी भागीदारी ली जा सकती है।

 

ग्रामीण मिशन, जिसे स्वच्छ भारत ग्रामीण के नाम से जाना जाता है, का उद्देश्य 2 अक्टूबर 2019 तक खुले में शौच से ग्राम पंचायतों को मुक्त करना है। इस मिशन की सफलता के लिए गांवों में व्यक्तिगत शौचालयों के निर्माण को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ सार्वजनिक-निजी भागीदारी से क्लस्टर और सामुदायिक शौचालयों का निर्माण करना भी है।

 

 

गांव के स्कूलों में गन्दगी और मैली की स्थिति को देखते हुएइस कार्यक्रम के तहत स्कूलों में बुनियादी स्वच्छता सुविधाओं के साथ शौचालयों के निर्माण पर विशेष जोर दिया जाता है। सभी

ग्राम पंचायतों में आंगनबाड़ी शौचालय और ठोस तथा तरल कचरे का प्रबंधन इस मिशन की प्रमुख विषय-वस्तु है। नोडल एजेंसियां ग्राम पंचायत और घरेलू स्तर पर शौचालय के निर्माण और उपयोग की निगरानी करेंगी। ग्रामीण मिशन के तहत 134000 करोड़ रूपये की लागत से 11.11 करोड़ शौचालयों का निर्माण किया जा रहा है।

 

 

व्यक्तिगत घरेलू शौचालय के प्रावधान के तहत, बीपीएल और एपीएल वर्ग के ग्रामीणों को केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा प्रत्येक शौचालय के लिए क्रमश: 9000 रुपये और 3000 रुपये का प्रोत्साहन -निर्माण और उपयोग के बाद- दिया जाता है। उत्तर-पूर्व के राज्यों, जम्मू-कश्मीर तथा विशेष श्रेणी के क्षेत्रों के लिए यह प्रोत्साहन राशि क्रमश: 10800 रुपये और 1200 रुपये है।

 

 

कार्यान्वयन की नियमित रूप से समीक्षा की जा रही है, परिणाम उम्मीद से अधिक हैं। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2014-15 में 5854987 शौचालयों का निर्माण किया गया जबकि लक्ष्य 50 लाख शौचालयों का ही था। इसमें लक्ष्य के 117 प्रतिशत तक सफलता हासिल हुआ है। 2015-16 में 127.41 लाख शौचालयों का निर्माण किया गया है जो लक्ष्य 120 लाख से ज्यादा है। 2016-17 में लक्ष्य 1.5 करोड़ रखा गया और इसमें 1 अगस्त 2016 तक 3319451 शौचालयों का निर्माण पूरा कर लिया गया है तथा बाकी के लिए भी तेजी से काम चल रहा है।

 

 

ग्रामीण मिशन के तहत 1 अक्टूबर 2014 से 1 अगस्त 2016 तक 210.09 लाख शौचालयों का निर्माण किया गया है। इसी अवधि में स्वच्छता का दायरा 42.05 प्रतिशत से बढ़कर 53.60 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

 

 

हालांकि, अंत में, स्वच्छता की कार्यप्रणाली में क्या व्यवहारिक परिवर्तन हुआ है यही मायने रखता है। यह जिलाधिकारियोंसीईओजिला पंचायत तथा जिला पंचायत के अध्यक्षों के संयुक्त प्रयासों का प्रतिफल होता है। इस सफाई अभियान से संबंधित राज्य स्तरीय कार्यशालाओं द्वारा अलग-अलग राज्यों में कार्य किया जा रहा है।

 

 

अंत में यह कि प्रधानमंत्री भी स्वच्छ भारत मिशन की सफलता के लिए मजबूती से इसके पीछे खड़े हैं। केन्द्र और राज्यों के बीच समन्वय उसके प्रतिनिधियों के राज्यों का दौरा करने और समन्वय बैठकों में भाग लेने से बढ़ा है। अंतत: हम कह सकते हैं कि स्वच्छ भारत मिशन सही रास्ते पर अग्रसर है।

 

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23 jan

राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाना 


 

विशेष लेख

 

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बरनाली दास

 

देश कल राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाने जा रहा है। प्रत्येक वर्ष 24 जनवरी को हम बालिका दिवस मनाते हैं, समाज में बालिकाओं के लिए समान स्थिति और स्थान स्वीकार करते है और एक साथ मिलकर हमारे समाज में बालिकाओं के साथ हो रहे भेदभाव और असमानता के विरूद्ध संघर्ष का संकल् लेते हैं।

 

लेकिन यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण और अत्यधिक चिंता का विषय है कि देश में वर्ष 1961 से ही बाल लिंग अनुपात तेजी से गिरता रहा है। हम वर्ष 2017 में है और 21वीं शताब्दी के दूसरे दशक को पूरा करने जा रहे है, लेकिन हम विचारधारा को बदलने में सफल नहीं हुए है।

 

एक शिक्षित, आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिला और कार्य स्थल तथा घर में सम्मानित महिला के लिए यह वास्तविकता जानकर कठिनाई होती है कि भारतीय समाज में सभी वर्गों में बड़ी संख्या में लोग बेटा होने की इच्छा रखते हैं और नहीं चाहते कि उन्हें बेटी हो। ऐसे लोग भ्रूण हत्या की सीमा तक जाते हैं।

 

विभिन् क्षेत्रों में कुछ लड़कियों द्वारा ऊंची उपलब्धि हासिल करने के बावजूद भारत में जन् लेने वाली अधिकतर लड़कियों के लिए यह कठोर वास्तविकता है कि लड़कियां शिक्षा, स्वास्थ् जैसे बुनियादी अधिकारों और बाल विवाह से सुरक्षा के अधिकार से वंचित हैं। परिणामस्वरूपआर्थिक रूप से सशक् नहीं है, प्रताड़ित और हिंसा की शिकार हैं। जनगणना आंकड़ों के अनुसार बाल लिंग अनुपात (सीएसआर) 1991 के 945 से गिरकर 2001 में 927 हो गया और इसमें फिर 2011 में गिरावट आई और बाल लिंग अनुपात 918 रह गया। यह महिलाओं के कमजोर होने का प्रमुख सूचक है, क्योंकि यह दिखाता है कि लिंग आधारित चयन के माध्यम से जन् से पहले भी लड़कियों के साथ भेदभाव किया जाता है और जन् के बाद भी भेदभाव का सिलसिला जारी रहता है।

 

लड़कियों के साथ व्यापक स्तर पर सामाजिक भेदभाव तथा नैदानिक उपायों की उपलब्धता और दुरूपयोग दोनों के कारण बाल लिंग अनुपात (सीएसआर) में कमी आई है। इस वास्तविकता से निपटना था और परिणामस्वरूप बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ (बीबीबीपी) योजना लागू की गई है। यह योजना विभिन् क्षेत्रों में पूरे देश में विचार विमर्श के बाद तैयार की गई है।

 

22 जनवरी, 2015 को हरियाणा के पानीपत में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लॉन् की गई बीबीबीपी योजना का प्राथमिक लक्ष् बाल लिंग अनुपात में सुधार करना तथा महिला सशक्तिकरण से जुड़े अन् विषयों का समाधान करना है। दो वर्ष पुरानी यह योजना तीन मंत्रालयों-महिला तथा बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ् और परिवार कल्याण मंत्रालय तथा मानव संसाधान तथा विकास मंत्रालय द्वारा संचालित है। महिला तथा बाल विकास मंत्रालय नोडल मंत्रालय है। यह योजना अनूठी है और मनोदशा रिवाजों तथा भारतीय समाज में पितृसत्ता की मान्यताओं को चुनौती देती है।

 

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना को लागू करने के लिए बहुक्षेत्रीय रणनीति अपनाई गई है। इसमें लोगों की सोच को बदलने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाना स्थानीय नवाचारी उपायों से समुदाय तक पहंचने पर बल देना, केन्द्रीय स्वास्थ् मंत्रालय द्वारा गर्भ पूर्व तथा जन् पूर्व नैदानिक तकनीकी अधिनियम लागू करना और स्कूलों में लड़कियों के अनुकूल संरचना बनाकर बालिका शिक्षा को प्रोत्साहित करना तथा शिक्षा के अधिकार को कारगर ढंग से लागू करना शामिल है। शुरू में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना देश के सौ जिलों में लागू की गई। पिछले एक वर्ष में रेडियो,टेलीविजन, सिनेमा, डिजिटल मीडिया तथा सोशल मीडिया सहित विभिन् मीडिया में कार्यक्रम को लेकर अभियान चलाने से जागरूकता बढ़ी है। इस अभियान के तहत सामूहिक सामुदायिक कार्य और उत्सवों का आयोजन किया गया जैसे लड़की का जन्मदिन मनाना, साधारण तरीके से विवाह को बढ़ावा देना, महिलाओं के संपत्ति के अधिकार को समर्थन देनासामाजिक तौर-तरीकों को चुनौती देने वाले स्थानीय चैम्पियनों को पुरस्कृत करना और युवाओं तथा लड़कों को शामिलकिया गया।

 

विभिन् स्तरों पर ग्राम पंचायतों के माध्यम से लोगों से संवाद किया गया। बातचीत में प्रत्यायित सामाजिक स्वास्थ् कार्यकर्ता (आशा), आंगनवाड़ी कार्यकर्ता (एडब्ल्यूडब्ल्यू) ऑक्सीलियरी नर्सिंग मिडवाइफ (एएनएम) तथा स्वयं सहायता समूह के सदस्यों, निर्वाचित प्रतिनिधियों, धार्मिक नेताओें और समुदाय के नेताओं को शामिल किया गया।

 

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान को व्यापक बनाने के लिए, विशेषकर युवाओं में व्यापकता के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों का भी इस्तेमाल किया गया और  जन साधारण में बालिका के महत् को लेकर सार्थक संदेश दिेये गये।

 

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना के क्रियान्वयन के दूसरे वर्ष में गर्भ पूर्व तथा जन्